Introduction & Elements of Communication System (संचार व्यवस्था) in Hindi

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परिचय (Introduction) सूचनाओं , भावनाओं अथवा विचारों के आदान – प्रदान की क्रिया को संचारण (communication) कहते हैं।

Communication System (संचार व्यवस्था)

कालान्तर में भाषा का विकास होने पर मनुष्य ने अपनी आवाज (ध्वनि) को सूचनाओं के आदान – प्रदान का माध्यम बनाया । इसके पश्चात् ढोल – नगाड़ों की ध्वनि को सूचना पहुँचाने का माध्यम बनाया गया । विशेष प्रकार से प्रशिक्षित पक्षियों को भी दूरस्थ स्थानों को सूचनाएँ भेजने का माध्यम बनाया गया । तत्पश्चात् इस कार्य के लिए दूतों का प्रयोग किया जाने लगा जो पैदल अथवा किसी वाहन से दूरस्थ स्थानों को जाकर सूचनाएँ पहुँचाते थे ।

जैसे – जैसे प्रौद्योगिकी का विकास होता गया वैसे – वैसे संचार के नये साधन भी विकसित होते गये ।

अत : आज विश्व के किसी भी कोने में बैठे व्यक्ति से विभिन्न संचार माध्यमों (वीडियोफोन , सैटेलाइट संचार व्यवस्था) द्वारा हम बातचीत कर सकते हैं तथा विभिन्न प्रकार की सूचनाओं को ई – मेल , फैक्स तथा इन्टरनेट आदि माध्यमों के द्वारा प्रेषित कर सकते हैं जिनके प्रेषण की गति प्रकाश की गति के समान है ।

आधुनिक संचार व्यवस्था निम्नांकित चरणों में विकसित होती हुई यहाँ तक पहुँची है :

  1. टेलीफोन की खोज के फलस्वरूप सन् 1850 में दूर संचार व्यवस्था प्रारम्भ हुई ।
  2. मारकोनी ने सन् 1901 में सर्वप्रथम रेडियो सम्प्रेषण का शुभारम्भ किया।
  3. अमेरिका में सर्वप्रथम सन् 1915 में एक सिरे से दूसरे सिरे तक टेलीफोन सेवा प्रारम्भ हुई तथा सन् 1941 में समाक्षीय केबिल द्वारा बहु – चैनल व्यवस्था प्रारम्भ की गयी ।।
  4. सन् 1962 में उपग्रह संचार व्यवस्था प्रारम्भ हुई तथा सन् 1965 में सबसे पहला भूस्थायी उपग्रह स्थापित किया गया ।
  5. अमेरिका में सन् 1970 में प्रकाशिक तन्तु (optical fibre) संचार व्यवस्था प्रारम्भ हुई । संचार व्यवस्था में एनालॉग तथा डिजिटल दोनों प्रकार के संकेतों का प्रयोग किया जा सकता है , परन्तु आजकल संचार व्यवस्था में मुख्यतः डिजिटल सिगनलों का प्रयोग ही किया जाता है।

संचार व्यवस्था के अवयव (Elements of Communication System)

वह व्यवस्था जिसके द्वारा सूचनाओं को एक स्थान से सम्प्रेषित किया जाता है तथा दूसरे स्थान पर इनको ग्रहण किया जाता है , संचार व्यवस्था कहलाती है । संचार पद्धति विद्युतीय , इलेक्ट्रॉनिक तथा प्रकाशीय आधार के अनुसार तीन प्रकार की होती है , परन्तु प्रत्येक संचार पद्धति के निम्नलिखित तीन मुख्य अवयव होते हैं :

(1) प्रेषित्र (Transmitter) –

इसका कार्य सूचना स्रोत द्वारा उत्पन्न सूचना सिगनल को वांछित रूप में परिवर्तित करके ग्राही स्थान के लिए प्रेषित करना होता है । उदाहरणार्थ , किसी वक्ता द्वारा दिये गये भाषण ( ध्वनि ) को सर्वप्रथम माइक्रोफोन द्वारा श्रव्य ( audible ) एनालॉग सिगनल में बदला जाता है । तत्पश्चात् इसको रेडियो आवृत्ति की वाहक तरंगों ( carrier waves ) के साथ मॉडुलित किया जाता है तथा प्रवर्धन द्वारा इनको प्रवर्धित किया जाता है । अन्त में इन प्रवर्धित सिगनलों को प्रेषित्र से जुड़े एण्टीना द्वारा विद्युत् – चुम्बकीय तरंगों के रूप में प्रेषित किया जाता है ।

(2) संचार चैनल (Communication channel) –

वह माध्यम जिससे होकर प्रेषित्र से भेजी गयी मॉड्यूलेटिड तरंगों ( विद्युत् चुम्बकीय तरंगों ) के रूप में सूचना अभिग्राही के एण्टीना तक पहुँचती हैं , संचार चैनल कहलाता है।

उदाहरणार्थ , एक तार , प्रकाश तन्तु ( optical fibre ) , बेतार 379fat yaratsch ( free space) S


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